Wednesday, 8 March 2017

महिला सशक्तीकरण और लोकतंत्र

एक होती है महिला। होने को देश की आधी आबादी भी महिला हो सकती है। अब जब महिला होती ही है,तो साल में उसका एक दिवस भी होता है।‌कल आठ मार्च को था भी,और छौटा मोटा नहीं था।‌अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस था। दुनियां भर में महिला सशक्तिकरण के कयी कयी कार्यक्रम आयोजित हुये।‌प्रिन्ट,इलेक्ट्रॉनिक और शोशल मीडिया पर ढेर सारे कशीदे काढे गये। महिलायें मात्र एक दिन में कितनी सशक्त हो जाती है,इसका आकलन करना जरा मुश्किल ही है। जेसे कि कल ही हुआ भी। प्रधानमंत्री जी गुजरात में महिला सरपंचो को सशक्त करने सम्मेलन में पहुंचे। उनका इरादा अपने मन की बात कहने का था,जेसा कि वे करते ही आये है। एक कोई महिला सरपंच प्रोटोकाल का जरा भी सम्मान न करते हुये अपने मन की बात कहने को मंच तक आ गयी। तुरंत प्रधानमंत्री जी के सुरक्षा सैनिको ने उस महिला का मुंह हाथ से बंद किया और वहां से बाहर जबरन खदेङ दिया। लोकतान्त्रिक देश में एक चुने हुये सर्वोच्च जन प्रतिनिधि के ठीक सामने एक चुनी हुई पहली पायदान की जन प्रतिनिधि की आवाज दबा दी गयी। लो हो गया लोकतंत्र मजबूत और साथ ही हो गयी एक महिला भी सशक्त। पी. चिदम्बरम ने अपने उपर जूता फैंकने वाले और केजङीवाल ने अपने उपर स्याही फैंकने वाले अथवा गाल पर तमाचा मारने वाले तक को अपनी बात कहने का मौका दिया,और लोकतंत्र का अपना धर्म निभाया। क्या प्रधानमंत्री जी देश के लोकतंत्र की पहली पायदान पर चुनी हुई महिला जन प्रतिनिधि की बात तक सुनना जरूरी नहीं समझते? मत भूलें कि यह वही लोकतंत्र है,जिसने प्रधानमंत्री जी को सबसे निचले स्तर से सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाया है...अस्तु। 
वीनू राय  ( विनोद दाधीच )

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