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Friday, 24 August 2018

आचार्य श्री तुलसी से लेकर वर्तमान में आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा हैं हरियाणा के सरदार सोहनसिंह जी मक्कड़ की, हर चातुर्मास में पहुंचते हैं धर्म-आराधना हेतु


गुरुवार 23 अगस्त, माधवरम, चेन्नई (  आलेख - गणपत भंसाली )


भारत अनेक पन्थो,मतों व सम्प्रदायों का देश हैं, नाना प्रकार के धर्मो की ये एक सुंदर बगिया है जहां विभिन्न सम्प्रदाय रूपी रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, यहां अनेकता में एकता के दर्शन होते हैं, अनेक धर्म ऐसे हैं जिनके अनुयायी बनने हेतु कोई विशेष औपचारिकताएं नही होती, ना ही अपना मूल धर्म छोड़ना पड़ता है,बस अपने परम् श्रद्धेय गुरु के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा के भाव जागृत हो जाने चाहिए, में इन दिनों चेन्नई स्थित माधवरम में चातुर्मासार्थ विराजमान शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के दर्शन निमित पहुंचा हुआ हूँ, चेन्नई रेलवे स्टेशन के प्रतिरूप आकार में निर्मित विशाल प्रवचन पांडाल "महाश्रमण समवसरण" में प्रातःकालीन प्रवचन श्रवण कर ही रहा था कि मेरी नजर केशरिया रंग की पगड़ी पहने एक बुजुर्ग सरदार जी पर पड़ी, जो कि प्रवचन श्रवण के दौरान मुंह पर रुमाल रूपी मुँहपट्टी लगाए हुए थे, मेरे मन मे उनसे रूबरू होने की जिज्ञासा जगी,जैसे ही प्रवचन सम्पन्न हुआ और श्रद्धालुओं का कारवां पांडाल से बाहर की और कूच करने लगा तो में शीघ्रता के साथ सरदार जी के समीप पहुंच गया, और उनसे अभिवादन कर कुछ जानने की अपनी मंशा व्यक्त की, तो उन्होंने सहर्ष जानकारी देने की अपनी सहमति प्रदान की, जब मैंने उनसे नाम,शहर, व्यवसाय व तेरापंथ धर्म संघ के प्रति जुड़ाव सम्बन्धी विगत जाननी चाही,तो उन्होंने बताया कि उनका नाम सरदार सोहनसिंह मक्कड़ है, वे हरियाणा के सिरसा स्थित मंडी कालांवाली के निवासी है, वे पिछले 18 वर्षों से तेरापंथ धर्म संघ से जुड़े हुए हैं, वे बताते हैं कि करीब 18 वर्ष पहले आचार्य श्री तुलसी नेतृत्व काल मे मुनि श्री रोशन लाल जी स्वामी व मुनि श्री सम्भवकुमार जी आदि सन्त हमारे मंडी कालांवाली चातुरमासार्थ पधारे हुए थे, तब उनके दर्शन करने का संयोग हुआ था, उनके प्रवचन सुनने हेतु जाने का सिलसिला नियमित रूप से प्रारम्भ हुआ, फिर गुरुदेव के प्रति श्रद्धा प्रगाढ़ होती चली गई, एक दिन गुरुवर के प्रति असीम श्रद्धा ने मुझे लाडनू की यात्रा करवा दी, श्री सोहनसिंह जी आंखों देखी का वर्णन करते हुए बताते हैं कि लाडनू के प्रवचन पांडाल में प्रवचन सम्पन्न होते ही गुरुदेव की दिव्य दृष्टि मुझ पर पड़ी और मुझे निकट पहुंचने हेतु इंगित किया, गुरुदेव की इस अनुकम्पा से मानो में तो निहाल ही हो गया, गुरुदेव के निकट पहुंचा और आप श्री ने मेरे बारे में जानकारी ली, मैंने सारी विगत बताई, कि किस तरह मेरा जुड़ाव इस धर्म संघ से हुआ, कभी कपड़े के कारोबारी रहे 76 वर्षीय श्री सोहनसिंह जी मक्कड़ इन दिनों निवृत है व नित्य गुरुद्वारा पहुंच कर धर्म-आराधना में लीन रहते हैं, वे अपने शहर कालांवाली में प्रत्येक शनिवार को गुरु इंगित अनुसार सामयिक आराधना करना नही भूलते, श्री सोहन सिंह जी ने बताया कि वे इन 18 वर्षों में आचार्य श्री तुलसी, आचार्य श्री महाप्रज्ञजी तथा वर्तमान में आचार्य श्री महाश्रमण जी के जहां-जहां चातुर्मास हुए हैं वहां-वहां वे कोलकोता व गोहाटी चातुर्मास को छोड़ सभी जगह पहुंचे हैं, व गुरुओं के दर्शन आराधना में लीन रहे हैं। वे कहते हैं कि अपने मूल धर्म से जुड़े रहते हुए भी आप अन्य धर्म की खूबियों व अच्छाइयों को अंगीकार कर सकते हैं, धन्य है श्री सोहन सिंह जी जैसे प्रगाढ़ श्रावक...
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(गुरुवार 23 अगस्त, माधवरम, चेन्नई )

Saturday, 23 December 2017

नाकोड़ा जैन तीर्थ पर पोह दशम मेले के 56 वर्ष पूर्व के वे अनमोल लम्हें जिन्हें स्मृत कर आज भी आनन्दित हो जाता हूँ

राजस्थान के नाकोड़ा जैन तीर्थ पर प्रतिवर्ष आयोजित पोह दशम मेले के संदर्भ में एक वर्ष पूर्व आज ही के दिन ये आलेख फेसबुक पर पोस्ट किया था, चूंकि नाकोड़ा तीर्थ का ये मेला गत दिनों ही सम्पन्न हुआ है, अतः मेला समाप्ति पश्चात ये लेख प्रेषित कर रहा हूँ, ताकि नए जुड़े मित्रों के लिए उपयोगी साबित होगा....

जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जब जब जन्म कल्याणक दिवस आता है तो नाकोड़ा जी तीर्थ पर आयोजित पोह दशमी के विशाल मेले के परिदृश्य जीवन्त हो उठते हैं, हालाँकि यह मेला वर्षो-वर्षों से नाकोड़ा के रूप में प्रसिद्ध मेवानगर तीर्थ पर आयोजित होता आ रहा हैं, मुझे करीब 55-56 वर्ष पूर्व के वे दृश्य स्मृत हे जब इस मेले में सम्मिलित होने हेतु नाकोड़ा के निकटवृति जसोल, बालोतरा, पचपदरा, असाडा टापरा, कानाना, पारलू, समदड़ी, सिवाना, मोकलसर आदि कस्बो से श्रद्धालु 'वोहणो' (बैलगाड़ियों) पर सवार होकर तथा जोधपुर, बाड़मेर,जालोर आदि दुरी के शहरों से बसों आदि से भोर के अँधेरे में सपरिवार मेवानगर (नाकोड़ा जी) तीर्थ पर पहुंचते थे, इन बैलगाड़ियों पर बिस्तर बिछा दिए जाते थे और परिवार के क्या बच्चे और क्या बड़े, हर कोई नए
या साफ सुथरे कपड़े (पायजामा-बुशर्ट या निकर-बुशर्ट) पहन कर सवार होते थे. कभी- कभी यह संख्या छोटे-बड़े मिलाकर आठ-दस तक पहुंच जाती थी, परिवार की महिलाएं घर के सदस्यों के बीच भी हाथ भर घूंघट निकाले हुए व हाथी दांत का असली चूड़ा पहने हुए सयुक्त स्वर में अत्यंत ही सुरीले कण्ठ से एक प्रचलित गीत गाती थी. जिसके बोल बड़े ही सुहाने थे, जब-जब यह मेला आयोजित होता है तो परिवार की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले... `चक सोंई रे उड़न्ते पंखेरू ने पूछ्यो, शंखेश्वर क़तरिक दूर....'( यानी उड़ते पंछी को पूछा जाता हैं कि शंखेश्वर तीर्थ अब कितना दूर है?) गीत की पंक्तियां कानो में रस घोलने लग जाती थी, सही मायनो में प्रभात वेला में महिलाओं द्वारा पवित्र भाव से गाए जाने वाला गीत प्रभु की किसी प्रार्थना-आराधना से कम नही होता था, यकीन मानिए कि हिचखोले खाती बेलगाडी की वो यात्रा इतनी सुखद व आनन्द दायक होती थी कि वर्तमान के इस आधुनिक व चकाचोंध भरे इस दौर में मसर्डिज,ओडी या बी एम् डब्ल्यू जैसी महंगी विलासिता पूर्ण कारों में भी वो आनन्द सम्भव नही हैं. बेलगाडी की यह यात्रा सिर्फ एक यात्रा ही नही होती थी, बल्कि परिवार के सामन्जस्य का अदभुत उदाहरण भी होती थी, जिस पथ से ये बेलगाडी गुजरती थी तो उसके दोनों और 'थोभ' ग्वारपाठा (एलोवेरा) के बड़े-बड़े पौधो की और बेल गाड़ी में बैठे बड़े बुजुर्ग छोटे लड़कों व युवाओं का ध्यान आकर्षित कराते हुए ये सीख देते कि अगर जीवन में कभी भी किसी भाई ने अपनी बहिन को अगर पीटा या उस पर हाथ उठाया तो उसके हाथ उस थोभ ( कंटीले ग्वारपाठे) की भांति उन पौधों के बीच उग जाएंगे, आज की भांति बच्चे उस दौर में तर्क नही करते थे, और बड़े बुजुर्गों की वह सीख सदैव स्मृत रख कर हृदयंगम कर देते थे. बेलगाडी पर सवार बच्चों को जब-जब कुछ खाने की इच्छा होती तो मीठे में गुड़ की डली या मिश्री या फिर बताशा तथा भोजन में रोटी सब्जी. ज्यादा से ज्यादा गुड़ का चूरमा या मैदे का सीरा परोस दिया जाता जो आज की महंगी से महंगी देशी विदेशी चॉकलेटों तथा मनभावन मिठाइयों से तो कहीं अधिक स्वादिष्ट व रुचिकर ही होती थी, पीने को पानी की केटली या फिर कपड़े की दिवड़ी में पानी समाया रहता, जहां तक इत्र सेन्ट जैसी खुशबु का प्रश्न है तो आज की तरह महंगे सेंट या परफ्यूम से कपड़ों को महकाया नही जाता था, अमूमन सरसों या तिल्ली का तेल ही उपयोग में लिया जाता या फिर घर पर बनाया ब्राह्मी आंवला या फिर चमेली का तेल जो बालों व चेहरे पर (चोपड़) मल कर अपने आस-पास के वातावरण को सुगन्धित कर देता था, जैसे ही नाकोड़ा तीर्थ नजदीक आता दिखता तो खुशियों का कोई ठिकाना नही रहता` क्योंकि मेले में हाथ से घुमाने वाले झूलों, बांसुरियों. पीपाड़ी (गुबारे के साथ लगी छोटी बांसुरी) माटी के खिलोने. खट्टी-मीठी टॉफियां, तथा रंग बिरंगी  
कुल्फियां व फ्रुट में केले आदि लेने हेतु जी मचलता था. साथ ही तीर्थ मण्डल की और से प्रत्येक श्रद्धालु की दी जाने वाली भाती (मीठी बूंदी तथा नमकीन सेव) को लेने हेतु मन में उतावलापन बना रहता, लेकिन ये सब मन्दिर में भगवान पार्श्व प्रभु व भेरू बाबा के दर्शन किए बिना मुमकिन नही था. अतः जल्दी जल्दी दर्शन करने का प्रयास बना रहता, दर्शन करने के पश्चात तीर्थ स्थल पर बोली के तहत हासिल की गई नोकारसी रूपी सामूहिक भोज ग्रहण किया जाता, जिसमें मिठाई आदि व्यंजनों से जी खुश हो जाता था. हालाँकि आज भी भाती व नोकारसी की परम्परा तीर्थ मण्डल की और से बदस्तूर जारी हैं. लेकिन इस भौतिकता भरी फ़ास्ट फूडी संस्कृति में उसका विशेष कोई महत्व नही. मन्दिर में दर्शन तथा भोजन स्थल पर भोजन आदि को सम्पन्न करने के बाद हम झूमते- नाचते अभिभावकों की अंगुली पकड़े मेले प्रांगण में पहुंचते. हम सभी बच्चों को मेले में प्रदर्शित मनभावन खिलोने टॉफियां कुल्फियां दिलाई जाती तथा झूलों का आनन्द उठाया जाता, सचमूच में इन पलों की ख़ुशी व उमंग का कोई वर्णन नही हो सकता यह अलौकिक आनन्द की घड़ियां थी,ऐसे हसीन पलों व लम्हों का साल-साल भर से इंतजार रहता था, मेरा मानना हैं कि यह ख़ुशी व ये आनन्द वर्तमान की इस चकाचौंध भरी दुनिया में कत्तई व किसी कीमत पर नही मिल सकता, आज भले ही हमारे समक्ष महंगे से महंगे ब्रांड की जींस, गोग्लस, मोबाइल्स, वीडियो गेम्स, या कोई और आकर्षण क्यों ना मौजूद हो, उस दौर की अनूठी अनुभूति को प्रदान नही कर सकते, जब तीर्थ स्थल से बेलगाडी घर की और रुख करती तो मन वैसे ही उदास हो जाता जैसे हम किसी परिजनों से लम्बे अंतराल के लिए बिछुड़ रहे हों. हमारा उत्सुकता के साथ अगली पोह दशम के मेले का इंतजार बना रहता, यह तो सिर्फ शाब्दिक वर्णन हैं. लेकिन साहब उन अद्वितीय लम्हों को स्मृत कर पुनः अभावों व सिमित संसाधनो की दुनियां में लौटने का मन होता हैं... काश कोई लौटा दे मेरे बचपन के उन अनमोल पलों को, तथा बेशकीमती लम्हों को ......लेखक - गणपत भंसाली 

Sunday, 27 August 2017

एक ही दिन हो संवत्सरी - आचार्य श्री महाश्रमण जी

तमाम पंथ हो जाए अगर एकमत
तो सफलता मिलेगी शत-प्रतिशत
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एक ही दिन हो संवत्सरी: मैत्री दिवस पर आचार्य श्री महाश्रमणजी की मैत्री भरी सराहनीय पहल, सचमुच में जैन एकता की और बढ़ते कदम।
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जैन धर्म मे अनेक मत,पंथ,गच्छ व सम्प्रदाय हैं,अनेक पंथ व सम्प्रदाय होना कोई आपत्ति का विषय नही हैं। आपत्ति जैन एकता में बाधक बनने वाली असहमति की है। और इस मुद्दे पर प्रदर्शित होने वाले मत-मतांतर की है। जब संथारे मुद्दे पर देश भर के जैनों ने पुरजोर रूप से एकता का परिचय दिया था तो उम्मीद की एक किरण जगी थी कि अब तमाम जैनों में मुख्य-मुख्य मुद्दों पर एकता अवश्य प्रदर्शित हो पाएगी। लेकिन जब इस वर्ष पर्युषण पर्व सम्पन्न हुआ तो पूर्व वर्षों की भांति संवत्सरी अलग-अलग ढंग से यानी 'अपनी ढपली अपनी राग' के अनुसार ही मनी। जो कि परिणाम वही 'ढांक के तीन पांत' वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसे ही थे। विडंबना यह हैं कि हर पर्युषण पर्व पर जैन समुदाय में संवत्सरी हर बार अलग-अलग रूप से मनाई जाती हैं। संख्या की दृष्टि से एक छोटे से धर्म संघ में इतनी मत भिन्नता क्या उचित है ? क्या यह सम्भव नही की जैन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों के धर्म गुरु आपस मे सामंजस्य बिठा कर संवत्सरी को एक ही दिन मनाएं ? भारतवर्ष की वर्ष 2001 की जनगणना में जैन धर्मावलंबियों की आबादी लगभग 42 लाख और वर्ष 2011 की जनगणना में 44 लाख के करीब थी। जो कि 04,2 व 05.4 के आस-पास हैं।  हालांकि अपुष्ट आंकड़ो से जैनों की संख्या भारत भर मे एक करोड़ से भी ज्यादा हैं। इतनी कम संख्या में होने के बावजूद हम दिगम्बर,श्वेताम्बर, मूर्ति पूजक, तेरापंथी, स्थानकवासी, के रूप में बंटे हुए हैं। बेशक अलग सम्प्रदाय हो, अलग पंथ हो, अलग गच्छ हो, इसमें आपत्ति जैसा कुछ भी नही हैं। यहां तक उपासना पद्दति में भी भिन्नता भी कोई एतराज का मुद्दा नही है। समस्या जैन एकता नही हो पाने की हैं। परम सन्तोष का विषय यह हैं कि हमारे जैन धर्म के विभिन्न पंथ व मत के आचार्य जैन एकता की दिशा में अंतर्मन से प्रयत्न करते नजर आ रहे है। इस मुद्दे पर वे आपस मे संवाद भी साध रहे हैं। आज जब कुछ पंथों व सम्प्रदायों का क्षमापना पर्व था तो सचमुच में यह मतभेद भुलाने की ही वेला थी व एक-दूसरे सम्प्रदाय के निकट आने की ही बेला थी। क्योंकि पर्युषण पर्व जैन एकता का परिचायक पर्व भी है। जैन एकता की उम्मीद की किरण आज उस समय बलवती हुई जब कोलकोता में चातुर्मासार्थ विराजमान तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य श्री महाश्रमण जी ने जैन एकता की पृष्ठ भूमि को तैयार करते हुए संवत्सरी एक ही तिथि को मनाने हेतु अपने सम्प्रदाय की और से सकारत्मक पहल की। परम श्रद्धेय आचार्य श्री ने क्षमापना के पुनीत अवसर पर मैत्री के भाव प्रदर्शित करते हुए अपने सन्देश में साधु मार्गी संघ के आचार्य श्री रामलाल जी म.सा तथा श्रमण संघ के आचार्य ड़ॉ श्री शिवमुनि जी म,सा के प्रति अपनी भावना प्रकट करते हुए संवत्सरी पर्व एक ही तिथि को मनाने हेतु निवेदन किया, आचार्य श्री महाश्रमण जी ने दोनों आचार्यों को संवत्सरी एक तिथि को मनाने सम्बन्धी प्रारूप तैयार करने हेतु विनम्र सुझाव भी दिया और अपना विचार प्रकट करते हुए बताया कि अगर विशेष कोई बाधा नही हुई तो जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ की भी इस निर्णय में सहमति बन जाएगी। सचमुच में अपने आप मे ये एक बहुत बड़ी एंव महत्वपूर्ण पहल हैं। उम्मीद करते हैं कि अलग-अलग पंथों व सम्प्रदायों के आचार्य, धर्मगुरु आदि आचार्य श्री महाश्रमण जी की इस अद्वितीय पहल पर अपनी सह्रदयता भरी सहमति प्रदान कराएंगे। इस तरह की आपसी सहमति बन जाने से काफी बड़ी सफलता मिल सकती हैं। उसके जैन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों व पन्थो आदि में भी इस मुद्दे पर सहमति बनने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। अगर ऐसा हो जाता है तो जैन एकता के क्षेत्र में ये बहुत बड़ी उपलब्धि एंव कामयाबी होगी। ये उल्लेखनीय हैं कि अतीत में तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य श्री तुलसी ने भी जैन एकता के लिए अथक प्रयास किए थे। गुरुदेव श्री तुलसी ने जब तक एकता स्थापित ना हो तब तक शक्कर उपयोग में लेने के त्याग कर दिए थे, जैन एकता की अनवरता बनाये रखने हेतु आचार्य श्री महाश्रमण जी निरन्तर रूप से प्रयासरत हैं। सितम्बर 2014 में दिल्ली में ऐसी ही एक सकारत्मक पहल हो चुकी हैं। उक्त अवधि में तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य श्री महाश्रमण जी, श्रमण संघ के आचार्य ड़ॉ श्री शिवमुनि जी, दिगम्बर मुनि श्री तरुण सागर जी तथा मूर्ति पूजक सम्प्रदाय के  आचार्य श्री अभयदेव जी की दिल्ली में आपसी सौहार्दपूर्ण भेंट भी जैन एकता की दिशा में एक बढ़ता हुआ कदम था। आज क्षमापना के अवसर पर परम श्रद्धेय आचार्य श्री महाश्रमण जी के और से एक अनूठी पहल यह भी रही कि साधुमार्गी संघ के आचार्य श्री रामलाल जी म.सा व श्रमण संघ के आचार्य ड़ॉ श्री शिवमुनि जी को श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ की और से 'आध्यात्म ज्योति' अलंकरण से अलंकृत करने की घोषणा की गई, जो कि साम्प्रदायिक सौहार्द की एक अदभुत एंव प्रेरक मिसाल है। ऐसे प्रयास अनवरत जारी रहने चाहिए। क्योंकि धर्मगुरुओं की आपसी सहमति को श्रावक समाज का सदैव तहे दिल से समर्थन रहा हैं, और रहेगा भी।

मशहूर कवि दुष्यंतकुमार ने ठीक ही कहा है कि..

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नही हो सकता
एक पत्थर तबियत से तो उछालो यारों....
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मौलिक विचार-
गणपत भन्साली, सूरत
9426119871
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