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वैसे कहा जाता हैं की कौरव सौ थे तो कमजोर थे ,पांडव पांच थे तो उनसे बलवान थे और कृष्ण अकेले थे तो सबसे बलवान थे. हर युग में ऐसी ही व्यवस्था थी जैसे आज हैं ,क्योकि मानव में वे सब अच्छी और बुरी प्रवत्तियाँ होती हैं जिससे वह भला बुरा समझा /पहचाना जाता हैं . मनुष्य जन्म से महान नहीं होता बल्कि कर्मों से ,आचरण से महान होता हैं .समस्या आज भी वही हैं जो जिस सीढ़ी से प्रगति करता हैं उसे तोड़ देता हैं या स्वार्थपूर्ति नहोने से उससे या उनसे अलग हो जाता हैं .लोभ ,लालच ,स्वार्थ ,छल ,निंदा,प्रमाद अपेक्षाएं ,जलन के कारण मनुष्य अपनों से अलग हो जाता हैं .यहाँ तक की जिस थाली या पातळ में खाता हैं उसमे भी छेद कर देता हैं .या उससे नहीं चूकता.मनुष्य इतना स्वार्थलिप्सी होता हैं की वह निजियों से भी कन्नी काट लेता हैं .
नदी का एक किनारा दूसरे किनारे को अच्छा कहता हैं और दूसरा पहले को .नेता जिस डाली से चढ़कर ऊंचाई पाता हैं वह उसी डाल को त्याग कर दूसरे डाल पर चला जाता हैं .जब बीज रहता हैं तब उसे सहारे की जरुरत होती हैं और जब वह अंकुरित होकर जड़े जमा लेता हैं और फल प्राप्त कर लेता हैं तब वह तृप्त होकर अलग हो जाता हैं ,या उसे अपनी अंतिम परिणति मिल जाती हैं तब विलग होता हैं तब वह बीज की अवस्था को ध्यान नहीं देता .यह ठीक हैं सबको पाली बदलने का अधिकार हैं पर जिस पानी रक्त से सिंचित होकर परिपुष्ट हुए उन्हें भूलकर या भुलाकर जाना अहसान फरामोशी नहीं कही जा सकती .
यह जरूर सुना था की डूबते सूरज को कोई नहीं पूछता ,उगते सूरज को सब पूजते हैं .खास तौर पर मानव समाज में यह भरपूर देखा जाता हैं .यदि आप गरीब हैं तो सब आपसे कन्नी काटते हैं और धनवान की ओर मख्खी जैसे चिपटे रहते हैं .पर जो व्यक्ति सुख में साथी रहते हैं उन्हें दुःख में भी साथमें रहना चाहिए जिस कारण हम उन्हें निष्ठावान कहते हैं आज इसकी कमी होती जा रही हैं . सबल पर सब भरोसा करते हैं और निर्बल को त्याग देते हैं .पर सबल निर्बल समय के कारण होता हैं .जैसे कोई भी व्यक्ति बड़ा या छोटा नहीं होता पर धन होने के कारण वह बड़ा या छोटा होता हैं .पर वर्तमान में पद ,प्रतिष्ठा ,भीड़ के कारण बड़ा या छोटा माना जाता हैं और कभी कभी एक गुंडा ही समाज में भरी होता हैं .
आज राहुल गाँधी की ताजपोशी हुई ,इसके पहले वह एक योध्या बन कर संघर्षरत हैं और वह अभिमन्यु जैसा विरोधियों से लड़ रहा हैं और वह जानता हैं की चक्रव्यूह से कैसे निकलना हैं .हार जीत इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना लड़ना . वह अकेला लड़ रहा हैं .उसकी पदोन्नति से उसके लोग शायद खुश न हो और कुछ न भी चाहते हो या मजबूरी में स्वीकार कर रहे हो पर वह अब पार्टी अध्यक्ष तो बन गया . और वह कौरवों की सेना से घिरा हुआ हैं ,कौरव की सेना में कुछ कांग्रेस पार्टी के नेता जिन्होंने कांग्रेस में रहकर अपना कद बढ़ाया और दूसरी पार्टी में पहुंचकर दूसरे या पीछे की पंक्ति के नेता की हैसियत से हाँसिया में रह रहे हैं उनको विश्वासघाती या अवसरवादी कहा जा सकता हैं और वे धोबी के कुत्ते न घर के न घाट के हो गए.
संघर्ष एक अंतहीन सुरंग होती हैं इसमें अनेक घटक काम करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण होता हैं समय .समय किसी का एक सा नहीं होता हैं ,सब उसके पुण्य पाप पर आधारित होता हैं .आज जो सत्तानशीं हैं कल वे सड़क पर थे और कल किसका क्या होने वाला हैं कोई नहीं जानता .पर समय की नजाकत को समझकर चलना चाहिए.आज कुछ भी हो वह अभिमन्यु जैसा युध्य के मैदान में डटा हैं और विरोधी राजगद्दी में होने से बलशाली हैं और होते भी हैं पर एक बात जरूर हैं की अभिमन्यु ने जिस प्रकार महाभारत में अपनी भूमिका निभाई थी वैसी ही आज राहुल भी निभा रहा हैं .इतनी विपरीत परिस्थिति में मैदानेजंग में डटा रहना कोई बड़ी बात नहीं हैं .इस साहस को स्वीकार करना होगा और विपक्षी जो राजा हैं ,राजगद्दी पर आसीन हैं उन्हें भी युध्य में पसीना बहाना पड़ रहा हैं आखिर क्यों ?
सत्ताशीन विगत बाइस वर्षों से काबिज़ हैं तो इतना क्यों घबराना .इसका मतलब हैं की कहीं न कहीं कुछ दाल में काला हैं..अन्यथा इतना भय क्यों ? सेनापति ने अपनी और अपने वीर योद्धयायों की फौज लगा दी पर अभिमन्यु लगातार लड़ता जा रहा हैं .इसमें अभिमन्यु बलशाली लग रहा हैं .
सत्ताधारी लड़ रहे हैं छल कपट से
यह करतब अधिक दिनों तक नहीं चलेगा
काठ की हांडी एक बार चढ़ती हैं आग पर
वादों का दिवाला खुल गया हैं पिटारों से
कमजोर नहीं समझो विरोधी को
आज अकेला वह बना हैं कृष्ण
और तुमने बना ली हैं कौरवसेना
उस सेना में यदि शकुनि हैं तो
कुछ नहीं करना पड़ेगा पांडवों को
अभिमन्यु अब नहीं छला जाएगा
क्योकि उसने जन्मोत्तर वर्तमान में
सीखी चक्रव्यूह की तोड़
डॉक्टर अरविन्द जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753
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मनोवैज्ञानिक बताते हैं की जब कोई मनुष्य उच्चता पर पहुंच
जाता हैं तब वह बहुत भयभीत होता हैं कारण उसे गिरने का भय रहता हैं .जिस
प्रकार परीक्षा में पास या फ़ैल होने का डर रहता हैं .पास होने वाले को
उच्चतम अंक पाने का भय रहता हैं. सुन्दर को कुरूपता का भय .यानि जो विकास
की बात करता हैं उसे विनाश का भय .जो मैदान में हैं उसे जीतने या हारने का
भय .और जिसे विजेता बनने का शौक उसे दिग्भ्रमित होने का भय .उसे हर समय
जीत का विषाणु के संक्रमण का भय .यानि जो जहाँ हैं वह द्वन्द में या अशांत
हैं .
सत्ता के समक्ष यदि साधु ,संत ,विद्वान् घुटने
टेकने लगते हैं तब सत्ता का अर्थ /महत्व समाज में कम होने लगता हैं .पहले
राजा संतो के चरणों में जाते थे अब संत महंत सत्ता सुख के लिए राजाश्रय
पाने को आतुर हैं ..जब से गुजरात चुनाव शुरू हुआ तो मानो ऐसा लग रहा हैं
जैसे भूमण्डल का चुनाव हो और चुनाव के दौरान पार्टियों ने अपना नंगा रूप
दिखा दिया ,वर्तमान में शब्दों का निम्म स्तरीय उपयोग जब जन सामान्य को
अपचनीय हैं तब बोलने वालों को जब आत्म चिंतन का मौका मिलता होगा तो अपराध
बोध अवश्य होता होगा यदि उनमे मानवीयता होगी.
आज
सत्तापक्ष के शीर्ष नेता विपक्ष की उपस्थिति .को पचा नहीं पा रहे हैं
.मात्र सड़े गले लिपलिपे शब्दों का मकड़ जाल फैला कर अपना अस्तित्व कायम
रखना चाह रहे उसमे वे असफल हो गए. चुनाव जनता की समस्यायों का न होकर
व्यक्तिवाद पर आधारित हो गया .क्या प्रदेश मौलिक सुविधाओं से परिपूर्ण हैं
या मूल समस्याएं अभी भी मुंह बांय खड़ी हैं .मोदी इस समय भारत के प्रधान
मंत्री नहीं लग रहे वरन एक सामान्य नेता के रूप में भटक रहे हैं ,दर दर की
ठोकरें खा रहे हैं सत्ता का लाभ उठाकर कुछ भी अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं .और
यह प्रलाप रुदन में बदल कर अभी एक दो दिनों में और विष वमन करेंगे .वैसे
मोदी का जादू प्रभावहीन होता जा रहा हैं . सिर्फ भाषणों में चिल्लाने से
उन्हें कुछ फायदा नहीं होना हैं कारण आजकल में और कोई शिगूफा छोड़ा जायेगा
जिससे उन्हें कितना लाभ होगा कहना असंभव हैं .
इसका एक
ताज़ा उदाहरण पूर्व प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जैसे प्रबुद्ध नागरिक
नेता के ऊपर यह आरोप की उन्होंने पाकिस्तान के नेताओं से मिलकर गुजरात
चुनाव से सत्ता परिवर्तन कराना चाहते हैं . यह बात एक प्रधान मंत्री या
उनकी पार्टी के नेताओं का अक्ल का दिवालियापन दिखाई देता हैं .वैसे मोदी जी
का आकलन ठीक हैं .जो व्यक्ति परिवार में नहीं रहता और स्व केंद्रित होता
हैं उसे सामाजिक व्यवस्थाएं अनुभवहीन लगती हैं . वे असामाजिकता में विश्वास
रखते हैं कारण जब उन्होंने स्वयं अपने नेताओं को जिनकी वैशाखी से चलकर इस
पद पर आरूढ़ हुए उनको दर किनार का दिया तब अन्यों के बारे में उनका कथन सही
हो सकता हैं .सत्ता परिवर्तन जनता के हाथ में हैं ,सत्ता की पतंग हाथ से
निकलने के कारण यह बौखलाहट हो सकती हैं .पर सत्ता की भूख इतना दीवाना
बना देती हैं की निजियों से भी दुराव करते हैं और विपक्ष को माटी की धुल
की भूल कर बैठते हैं .अभी कल एक नया शिफूगा छोड़ा जाएंगे क्योकि परसों
मतदान हैं .उस शिफूगा का उत्तर मतदान के दूसरे दिन होगा तब तक वोट डल
जायेंगे..
यह बात तो निश्चित हो गयी की गुजरात मॉडल फेल
हैं और विकास का दावा कही न कही मोदी को दश रहा हैं नहीं तो इतनी ऐड़ी छोटी
की मेहनत क्यों करनी पड़ रही हैं .यानी कथनी और करनी में बहुत अंतर होना
चाहिए. मोदी सिर्फ भाषणों में लच्छेदार बात करते हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और
हैं . हमारे देश में विगत वर्षों में कोई विकास नहीं हुआ .जितना विकास हुआ
हैं मात्र तीन वर्ष में !जब विकास किया तो डरना क्यों. मोदी जी ने कल जो
आरोप या घटिया आरोप या निमंतर आरोप पूर्व प्रधान मंत्री पर लगाए वे अत्यंत
असम्मानजनक और प्रतिष्ठा के विरुद्ध रहा .
वैसे इस
गुजरात चुनाव ने सब नेताओं की कलई खोल कर रख दी .अब ऐसे समय हम किसी को
आदर्श /महान/महापुरुष कहने के योग्य नहीं समझते सबके दोहरे रूप सामने आ
गए.सब बौराएँ हैं ,सब दिग्भ्रमित या मानसिक विकृति से पीड़ित हैं या बुद्धि
ह्रास होने से भयभीत हैं.चुनाव कोई बड़ी घटना या दुर्घटना नहीं हो सकती
जितनी शब्दों के द्वारा सबने नैतिकता की तिलांजलि दे दी. हमें सब मालूम हैं
ये सब एक थैली के चट्टे बट्टे हैं .चोर चोर मौसरे भाई हैं .यह सत्तानशीनों
को शोभा नहीं देता .
क्यों इतना गर्व करते हो अपने कर्मो पर ,
जो किया हैं उसको तो भोगना होगा ,
दिनरात विकास का डंका बजाने वाले
अब क्यों अपने डंके से डर रहे हो
क्या यह स्वयं की प्रतिध्वनि तो
नहीं ललकार रही हैं मोदी को
अब चिड़िया चुग गयी खेत
अब पछतातयें का होत,
शब्दों के वाणों से कोई नहीं मरता
कौआ को कोसने से कितने मरे अब तक
पर इस चुनाव ने मोदी एंड कंपनी को
विपक्षियों ने पानी पिला दिया
यह भविष्य के लिए चेतावनी हैं
जमीनी हकीकत पर लाओ वादों को
डॉक्टर अरविन्द जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753